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कलेक्टर कार्यालय में सूचना के अधिकार कानून की उड़ाई जा रही है धज्जियां

बिलासपुर। एक तरफ राजनेता और नौकरशाह प्रजातंत्र के कार्य में पारदर्शिता की बात करते हैं और दूसरी तरफ उनके ही मातहत अधिकारी एवं छोटे कर्मचारी शासन की कार्यशैली को शिथिलता की ओर धकेल रहे हैं। हाल ही में न्यूज़ हब इनसाइट को बिलासपुर कलेक्टर कार्यालय में हो रही अनियमितताओं की लगातार शिकायतें प्राप्त हुई हैं। न्यूज़ हब इनसाइट की टीम ने जब सच्चाई जानने के लिए कलेक्टर कार्यालय का जायजा लिया तो पता चला कि सूचना के अधिकार शाखा में पदस्थ कर्मचारी खुलेआम इस कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं।
आम लोगों से मिली जानकारी के अनुसार जानबूझकर सूचना 30 दिनों के भीतर नहीं दी जाती। आम लोगों का कहना था कि आवेदन देते समय भी कलेक्टर कार्यालय के कर्मचारियों द्वारा बदतमीजी की जाती है। और जानबूझकर 30 दिनों के अंदर जवाब नहीं दिया जाता। आम जनता को जानबूझकर प्रथम अपील में ढकेला जाता है ताकि  आवेदक  थक-हारकर पीछे हो जाएं। 
सूचना का अधिकार कानून 2005 में लागू हुआ था, यह कानून आम आदमी के हक का कानून है। आम आदमी ही लोकतंत्र में सरकार को चुनता है और नौकरशाह पूरी तरह से सरकार के प्रति जवाबदार होता है। लेकिन बिलासपुर कलेक्टर के नाक के नीचे यह सब होना अशोभनीय है। लगता है, इस कृत्य के पीछे स्वयं बड़े अधिकारियों का इशारा हो सकता है।
वैसे तो समय-समय पर कलेक्टर पी. दयानंद सारे विभागों की समीक्षा बैठक लेते रहते हैं। लेकिन उनके ही कार्यालय के कर्मचारियों की हरकत पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। सूचना के अधिकार कानून की धज्जियां उड़ाना अपने आप में गंभीर मामला है। इस मामले में कलेक्टर को गंभीर होकर अपने कार्यालय की व्यवस्था को ठीक करना होगा, अन्यथा आने वाले समय में उग्र आंदोलन का सामना करना पड़ सकता है।
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