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मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं…,अटल ​बिहारी की कविता

 

नई दिल्ली। भारतीय राजनीति के शिखर पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी अपने कुशल नेतृत्व और ओजस्वी वक्ता के रूप में ही नहीं बल्कि एक लोकप्रिय कवि के रूप में भी याद किए जाएंगे।  राष्ट्रधर्म और वीरअर्जुन अखबारों के संपादक रहे वाजपेयी ने पत्रकारिता में ही नहीं बल्कि साहित्य की दुनिया में भी अपनी कलम की धाक जमाई थी और मंचों पर अपने उद्गारों से श्रोताओं का वह मन मोह लेते थे।

वह व्यक्तित्व से भले ही राजनीतिग्य रहे हों लेकिन हृदय से कवि ही थे। इसीलिए उनकी राजनीति में भी गहरी संवेदना और मानवीयता का पुट था। वाजपेयी की यह कविता,’काल के कपाल पर लिखता-मिटाता हूँ। गीत नया गाता हूँ।’हिदी कविता की अमर पंक्तियां बन गई और जब वह मंच पर यह पंक्तियां सुनाते थे तो तालियों की गड़गड़ाहट से सभागार गूंज उठता था।

उन्होंने इस कविता में राजनीति के दुश्चक्र और पाखंड को भी उजागर किया था। राष्ट्रवादी चेतना से भरपूर उनकी कविता में ओज और लय के साथ-साथ एक गहरा राजनीतिक दर्शन भी छिपा हुआ था। वह जीवन को मृत्यु से बड़ी घटना मानते थे। इसलिए उनकी कविता मौत से ठन गई काफी चर्चित हुई थी और आज अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान(एम्स) में 11 जून से जीवन और मृत्यु के बीच हुए उनके संघर्ष को देखा जा सकता है और इस तरह उनकी यह कविता उन पर चरितार्थ हुई। 

इस मौके पर पेश हैं, उनकी चुनिंदा कविताएं। वर्ष 1988 में जब वाजपेयी किडनी का इलाज कराने अमेरिका गए थे तब धर्मवीर भारती को लिखे एक खत में उन्होंने मौत की आंखों में देखकर उसे हराने के जज्बे को कविता के रूप में सजाया था। आज एक बार फिर याद आ रही यह कविता थी- ‘मौत से ठन गई’… 

ठन गई! 
मौत से ठन गई! 

जूझने का मेरा इरादा न था, 
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था, 

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई, 
यूं लगा जिंदगी से बड़ी हो गई। 

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं, 
जिंदगी सिलसिला, आज कल की नहीं। 

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूं, 
लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं? 

तू दबे पांव, चोरी-छिपे से न आ, 
सामने वार कर फिर मुझे आजमा। 

मौत से बेखबर, जिंदगी का सफ़र, 
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर। 

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं, 
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं। 

प्यार इतना परायों से मुझको मिला, 
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला। 

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किए, 
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए। 

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है, 
नाव भंवरों की बांहों में मेहमान है। 

पार पाने का क़ायम मगर हौसला, 
देख तेवर तूफ़ां का, तेवरी तन गई। 

मौत से ठन गई। 

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