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वर्चस्व को चुनौती मिलता देख बिफरे विधायक समर्थक……

बिलासपुर(शशांक दुबे)। बिलासपुर जिले का लम्बा शांतिपूर्ण सांस्कृतिक विरासत लेखा है, पर अब इसे ऐसी कुछ ताक़तें ख़राब करने पर आमादा हैं जिनके राजनीतिक वर्चस्व को चुनौती मिल रही है।
3 जून को सिविल लाइन क्षेत्र के अंतर्गत मगरपारा में रोज़ा अफ्तार का एक कार्यक्रम स्थल का टेंट न.पा.नि बिलासपुर ने हटा दिया निगम अधिकारियों के अनुसार इसे इसलिए हटाना पड़ा क्योंकि यह कार्यक्रम रोड पर था और इससे सामान्य यातायात बाधित होता है।
यह माह रोज़े का पवित्र माह है और इस माह को इबादत का माह भी कहा जाता है, रोज़ेदार शाम के ही वक़्त रोज़े खोलते हैं शहर में विभिन्न स्थान पर पृथक-पृथक संस्थाएं और निजी व्यक्ति रोज़ा अफ्तार की पार्टी रखते हैं।
आयोजक अपनी पसंद के आधार पर मुख्य अतिथि भी आमंत्रित करते हैं। मगरपारा का विवाद इसी बात को लेकर है रोज़ा अफ्तार से जुड़े युवा का स्पष्ट कहना है कि उन्होंने अपने कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि शैलेश पांडे को आमंत्रित किया। इस बीच न.पा.नि के एक एल्डरमैन ने उनसे संपर्क किया और स्थानीय विधायक व नगरीय निकाय कैबिनेट मंत्री को मुख्य अतिथि आमंत्रित करने को कहा।प्रस्ताव न मानने पर निगम दस्ते से कार्यक्रम स्थल का टेंट हटवा दिया।
स्थानीय मंत्री और कांग्रेस नेता शैलेश पांडे के मध्य यह दूसरा मौका है जब जब शहर विधायक समर्थकों ने किसी आयोजन पर अपने मंत्री को अतिथि बनाने दबाव डाला। पिछली बार मंत्री ग्रुप के एक सदस्य पटनायक ने एक कार्यक्रम के मंच पर शैलेश पांडे को सुझाव दिया था कि वे कार्यक्रमों में मुख्य अथिति व अध्यक्षता करने से बाज़ आये। इस बाबत् शैलेश पांडे ने तब एक लिखित शिकायत शहर पुलिस अधीक्षक के पास दर्ज कराई थी।
कुछ मामला लोकप्रियता और राजनीति से जुड़ा है, 2003 के बाद लगातार प्रदेश में भाजपा का शासन है इसमें तब और अहंकार आ गया जब 2014 में केंद्र में भी भाजपा बैठ गई। पिछले कई वर्षों से नेता शहर विधायक की रजा से राजनीति कर रहे हैं। कुछ लोगों का तो यह तक दावा है कि मंत्री के विरुद्ध कोई भी धरना प्रदर्शन पर जाने वाला धरने के पहले या बाद में अपनी मजबूरी से उन्हें अवगत करा ही देता है।
वर्ष 2018 में चुनाव है राजनैतिक वर्चस्व को चुनौती मिली है, लगता है कि जिन्हें चुनौती मिली है वे प्रतिस्पर्धा न कर माहौल बिगाड़ने वाला काम कर रहे हैं मामला रोज़ा अफ्तार मात्र का नहीं हैं इसके पूर्व शंकराचार्य ने एक बार मंच से बिना नाम लिए चेतावनी दी थी जिसकी गूंज कई दिन तक रही।
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