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रेलवे को “क्लीन” का तमगा और बदहाल खेल मैदान

रेलवे के सिर सबसे क्लीन का ताज और बेबस खेल मैदान

बिलासपुर। (सत्येंद्र वर्मा )-खिलाड़ियों की सुविधाओं और बेहतर अभ्यास के उद्देश्य से खेल मैदानों को बनाया जाता है, बेहतर रख रखाव खेल मैदान के लिये ज़रूरी होता है ताकि अभ्यास में खिलाड़ियों को समस्याओं का सामना ना करना पड़े। वहीं, इसके जिम्मेदार अधिकारी ही अगर अपने कर्तव्य से विमुख हो तो इसकी बदहाली की कल्पना की जा सकती है, जो खेल और खेल प्रतिभाओं को रोक लगाने जैसा है, जिस कारण खिलाड़ियों द्वारा किये जा रहे खेल अभ्यास को भी क्षति होती है, जिसका प्रभाव सीधे उनके भविष्य पर हो सकता है।

                                                          बात 1912 की है, शायद इससे भी पहले जब एनईआई द्वारा इंस्टिट्यूट फुटबाल ग्राउंड स्थापित किया गया था। यहां बीते समय खेलप्रेमियों को अंग्रेज अधिकारी, फुटबॉल व अन्य खेलों का प्रशिक्षण दिया करते और अलग-अलग खेलों का आयोजन कर खिलाड़ियों की प्रतिभा निखारा करते थे। आज वही SECRसंघ के अधीन है /आज भी यहां अंग्रेज अधिकारियों की बनाई परंपरा में खिलाड़ियों को प्रशिक्षित तो किया जाता है पर यह खेल मैदान, जो उस समय बिलासपुर की शानों शौकत की मिसाल था वह रखरखाव के अभाव में बदहाली के आंसू बहा रहा है। ऐसी स्थिति खिलाड़ियों के भविष्य पर सबसे बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।

एनईआई फुटबॉल ग्राउंड में बुनियादी सुविधाओं का अभाव

दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे खेल संघ के अधीन बिलासपुर मंडल के एनईआई फुटबॉल ग्राउंड में बुनियादी सुविधाएं नहीं है, एक समय था जब यहां फुटबॉल समेत अन्य खेलों का आयोजन होता था। आज यहां बुनियादी सुविधाओं के अभाव में खिलाड़ियों व खेलप्रेमियों से गुलजार रहने वाला स्टेडियम अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। वहीं, यहां अभ्यासरत खिलाड़ी अपने भाग्य को कोस रहे हैं। लगता है कि इस मैदान की देखरेख की व्यवस्था और होने वाला खर्च कागज में ही हो रहा है, क्योंकि यहां खिलाड़ियों और खेलप्रेमी दर्शकों का ध्यान नहीं रखा जाता इसका पता मैदान की बदहाली से चलता है।
 
       
 मैदान फुटबॉल का, मूलभूत सुविधाओं का पता नहीं

खेल खेल में जीते इंडिया खेल खेल में बढ़ता इंडिया, आओ खेलें, खेलो इंडिया, खेल ही जीवन है, जीवन ही खेल है, जैसे खेल को बढ़ावा देने वाले स्लोगन दीवारों पर ही अच्छे लगते हैं खेल कूद को बढ़ावा और खेल मैदान में सुविधाओं के होने का भ्रम, पैदा कर, बेवजह, वाहवाही लूट रहे दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे संघ, बिलासपुर मंण्डल के खेल अधिकारियों को एनआईए के फुटबाल ग्राउंड की बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था करने तक की फुर्सत नहीं।

जानिये किन मूलभूत सुविधाओं से जूझ रहे खिलाड़ी और मैदान

कहने के लिए तो बिलासपुर रेलवे जोन को देश के सबसे क्लीन स्टेशन का खिताब मिल चुका है, वहीं एनआईए के फुटबॉल ग्राउंड की बदहाली के सामने बिलासपुर रेलवे जोन के खेल अधिकारियों के कथनी और करनी में बड़ा फर्क नज़र आता है फुटबॉल मैदान का दर्शक गैलरी अर्थात् वह जगह जहां दर्शक बैठकर मैच का आनंद लेते हैं पूरी तरह से जर्जर है, मैदान के चारों ओर बनी गैलरी अंदर और बाहर उगी कटीली झाड़ियां अव्यवस्था की पोल खोलती है, भले ही व्यवस्थापकों नें अधिकारियों की नजर में पर्दा लगाने, रंग रोगन कर मैदान की बदहाली को छिपाने की हिमाक़त की है। लेकिन लकड़ियों के, बैसाखियों के सहारे, खडा दर्शक दीर्धा और उसके नीचे बने सांप की बांबियां अव्यस्था की पोल खोलता नज़र आता है। जो दर्शकों के जीवन के लिये भी खतरनाक साबित हो सकता है।

                                           मैदान के शौचालय स्वच्छ भारत अभियान के विपक्ष में वक़ालत कर रहे हैं। क्षेत्रीय व दूर दराज से खेलों में भाग लेने रेलवे आये महिला व पुरुष खिलाड़ियों के लिये मैदान में बने शौचालय उपयोग योग्य नहीं। चेंजिंग रूम की बदहाली रेलवे की व्यवस्था पर सवाल उठाता नज़र आ रहा है।

मैदान में बने चबुतरा जिसे मंच का रुप दिया गया है, जिस पर रेल अधिकारियों द्वारा खिलाड़ियों को पुरुस्कृत किया जाता है। आज हाले बदहाल है इसके चारों तरफ झाड़ियों का उगा होना, मंच में जंग लगी लोहे की जर्जर सीढियां, जर्जर चबुतरे के बीचों बीच उगी झाड़ियां मैदान की व्यवस्था पर सवाल खड़ा करती है। खेल मैदान के रख रखाव के लिये ना जाने कितना रुपया कागजों में ही खर्च कर दिया जाता है, लेकिन ज़मीनी हक़ीकत कुछ और ही तस्वीर बयां करती है।

स्थिति ऐसी है कि खेल मैदान में आवारा पशुओं का जमावड़ा है, शाम होते ही असमाजिक तत्वों का डेरा हो जाता है मैदान के कोने में पड़े शराब और बीयर की बोतलें व केन इस बात की गवाही दे रहे हैं की यह सब रेल व खेल प्रबंधन को नज़र नहीं आता या जिम्मेदारों द्वारा देखकर भी इन समस्याओं को अनदेखा कर दिया जाता है।

उबड़ -खाबड़ मैदान में क्रिकेट टुर्नामेंट का आयोजन

रेलवे के नार्थ ईस्ट इंस्टिट्यूट के बदहाल फुटबाल ग्राउंड में इंटर डिपार्टमेंटल टेनिस बाॅल क्रिकेट टुर्नामेंट का फ्लड लाईट आयोजन किया गया था। रात में होने वाले इस क्रिकेट मैंच के आयोजन के लिये जहां फुटबाल मैदान में फ्लड लाईट लगाने खेल मैदान को खोदकर बांस के मचान पर लाईट लगाई गई थी। उबड़ खाबड़ मैदान में बाधाओं के बीच खिलाड़ियों नें अपने खेल का प्रदर्शन किया था। जहां खेल मैदान और उसमें उपलब्ध सुविधाओं के अभाव में खिलाड़ियों नें दबी जुबांन से सवाल उठाए थे। बावजूद इसके रेलवे प्रशासन व खेल विभाग ने अबतक कोई कदम ग्राउंड की अव्यवस्थित असुविधाओं को ठीक करने नहीं उठाया।

खेल प्रतियोगिताओं का भव्य आयोजन और मैदान ख़स्ताहाल

सत्रह रेलवे जोन में एक दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे बिलासपुर, में एन ई आई के तत्वावधान में ग्रीष्मकालीन खेल प्रशिक्षण शिविर 2018 का सशुल्क आयोजन स्थानीय एन ई आई मैदान में किया जा रहा है। प्रचारित पाॅम्पलेट में उल्लेखित खेल जैसे फुटबाल, बॉलीबाल, बास्केट बाॅल, मार्शल आर्ट के प्रशिक्षण के लिये शुल्क लिए जा रहे, प्रशिक्षण लेने वाले खिलाड़ियों के साथ छलावा साबित हो रहा है क्योकि एन ई आई में बने उपरोक्त खेल ग्राउंड में, खिलाडियों के खेलने की सुविधाओं का अभाव, स्पष्ट नज़र आता है। इन सब अव्यस्थाओं के बावजूद जिम्मेदारों का मौन रहना संदेहजनक है।

कहते हैं खेल देश का भविष्य होता है पर खेल प्रतिभा को विकसित करने और खेल में किसी भी खिलाड़ी का महारथ होने के लिए बेहतर मैदान में अभ्यास की आवश्यकता होती है। इसलिए खेल मैदान को दुरुस्त रखना खिलाड़ी भविष्य को उज्जवल रखने के दृष्टिकोण से अति अनिवार्य है। बहरहाल दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे संघ बिलासपुर के अधीन खेल मैदान का हाल ठीक इसके विपरीत है। खिलाड़ियों को मिलने वाली पर्याप्त सुविधाएं ना होने के कारण खेल और खिलाड़ियों का भविष्य मैदान में ही अटका पड़ा है। खेल और रेल प्रशासन की गैरजिम्मेदारी खिलाड़ियों को खुद ही जोर अजमाईश करने मजबूर कर रहा है। जो सीधे तौर पर खेल प्रबंधन और रेल प्रशासन पर तीखा प्रहार है। अब देखना है कि क्या रेल प्रबंधन खिलाड़ियों के हितों को ध्यान में रखते हुए और मैदानों की व्यवस्था सुधारने कोई ठोस कदम उठायेगे या नहीं।

क्या दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे संघ, बिलासपुर मंडल को मैदान और खिलाडियों की प्रतिभा को निखारनें कोई फंड नहीं मिलता है? यदि मिलता है तो फिर बिलासपुर रेलवे के अधीन इन खेल मैदानों की ऐसी दुर्दशा के लिये जवाबदार कौन?

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