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मंत्री रविन्द्र चौबे के बिलासपुर विभाग से वेतन प्राप्त करने वाला साहित्यकार कैसे पहुंच गया शोध पीठ तक

वरिष्ठ पत्रकार शशांक दुबे की कलम…
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में इन दिनों साहित्यकारों के पुनर्वास की विशेष योजनाएं चल रही हैं। आप यदि असली साहित्यकार हैं तो इस पुनर्वास योजना का लाभ आपको नहीं मिल सकता; क्योंकि यह योजना उन साहित्यकारों के लिए है, जो वर्षों से सरकारी नौकरी कर रहे हैं और मजे से वेतन ले रहे हैं। जिन्हें बिना काम के पूरे भत्ते मिल जाते हैं, चिकित्सा सुविधा मिल जाती हैं और इस सब के एवज में ना तो घर से निकल कर दफ्तर और दफ्तर में मिली हुई कुर्सी, टेबल तक जाना नहीं पड़ता है। हां! ऐसे साहित्यकार से यदि आपको मिलना है तो बिलासपुर स्थित इंडियन कॉफी हाउस में शाम के समय जाइए बैठे मिल जाएंगे। ऐसी योग्यता यदि आप में हैं और इसके साथ आप शब्दों से खेलना जानते हैं, छत्तीसगढ़ के साहित्य प्रेमी आईएएस अधिकारियों से दोस्ती है, सरकार के मुखिया का सलाहकार आपका लंगोटिया है तो आप इस पुनर्वास योजना के लिए सच्चे हकदार हैं।
हाल ही में सरकार ने कांग्रेस के पुराने महामंत्री सोवियत विचारधारा के समर्थक दिवंगत हो चुके नेता के नाम पर शोध पीठ बनाई और उस शोध पीठ की कमान एक ऐसे पॉलिटेक्निक, डिप्लोमा, ओवासियल को दी, जो अभी जल संसाधन विभाग से रिटायर ही नहीं हुआ है । 
आज जब हमने जन संसाधन विभाग के स्थापना कक्षों की धूल छांटना प्रारंभ की तो 11वें नंबर के पूछताछ में हमें पता चला कि यह महान साहित्यकार इन दिनों जीपीएम में पदस्थ हैं। हम इस स्टोरी का परत दर परत ज्ञान विधा की बारीकियां आपको बताएंगे। इस कहानी में साहित्य कम जुगाड़, जातिवाद और निज संबंध ज्यादा है। शोध पीठ बनी नहीं और प्रारंभ हो गया खेल। 
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