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नरवा, गरूवा, घुरवा और बारी बनेगी गांवों में समृद्धि का आधार : भूपेश बघेल

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मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में उच्च स्तरीय बैठक आयोजित

 संबंधित विभागों को कार्ययोजना बनाने के निर्देश 

रायपुर / मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की ने कहा है कि नरवा, गरूवा, घुरवा और बारी गांवों की समृद्धि का आधार बनेगी। उन्होंने इस संबंध में सर्वसंबंधित विभागों को क्रियान्वयन के लिए समयबद्ध कार्ययोजना बनाने के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री ने छत्तीसगढ़ मंें नदी-नालों के पुर्नजीवन, गांव में पशुपालन और नस्ल सुधार, गोबर गैस और जैविक खाद जैसे कार्यों से गांव और किसानों को खुशहाल बनाया जा सकता है और कृषि लागत में कमी लायी जा सकती है। आवारा पशुओं की खेतों में रोकथाम कर द्विफसलीय रकबा भी बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने विभिन्न विभागों के द्वारा संचालित योजनाओं के साथ नाला संवर्धन, गौठान निर्माण, जैविक खाद के उत्पादन एवं सब्जी एवं फलों की बाड़ी के उत्पादन से जोड़ने को कहा।

मुख्यमंत्री आज यहां मंत्रालय (महानदी भवन) में नरवा, गरूवा, घुरवा और बारी के विकास और संरक्षण के संबंध में आयोजित उच्च स्तरीय कमेटी की बैठक को सम्बोधित कर रहे थे। बैठक में कृषि एवं जल संसाधन मंत्री रविन्द्र चौबे, पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री टी.एस. सिंहदेव, मुख्य सचि सुनील कुमार कुजूर, अपर मुख्य सचिव कृषि के.डी.पी. राव, अपर मुख्य सचिव पंचायत एवं ग्रामीण विकास आर. पी. मंडल, मुख्यमंत्री के सलाहकार विनोद वर्मा, रूचिर गर्ग, राजेश तिवारी, प्रदीप शर्मा सहित संबंधित विभागों के वरिष्ठ अधिकारीगण उपस्थित थे।

उल्लेखनीय है कि मुख्य सचिव की अध्यक्षता में नरवा, गरूवा, घुरवा और बारी के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए उच्च स्तरीय कमेटी बनायी गयी है। पूरे प्रदेश में कार्यक्रम का मूल्यांकन एवं गति देने का कार्य करेगी।
     

मुख्यमंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ में पानी की कमी नहीं है, इसके संरक्षण की जरूरत है। प्रत्येक विकासखंड में नदी-नालों के उद्गम स्थल से शुरू करते हुए पानी के प्रबंधन के लिए प्लानिंग करना होगा। उन्होंने इसके लिए इसरो से प्राप्त नक्शे का उपयोग करने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि नदी- नालों में बारह महीने पानी रहे, इसके लिए छोटे-छोटे बोल्डर चेक डेम जैसी संरचनाओं की जरूरत है।  इससे नदी-नालों को पुर्नजीवन मिलेगा।

मुख्यमंत्री ने कहा कि गांवों में स्वयं के संसाधनों ने समृद्ध गांव बनने की क्षमता है, जरूरत है उनके समुचित संयोजन एवं समन्वय की। मुख्यमंत्री ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था में जैविक खाद के प्रारंभिक संसाधन के रूप में चिन्हिंत करते हुए गोठान के निर्माण एवं सामुदायिक जैव उर्वरक एवं गोबर गैस निर्माण की जरूरत पर बल दिया और निर्देशित किया कि इसे गौठान के किनारे ही विकसित किया जाए, ताकि गांव की मूलभूत जरूरतों पानी, जैविक उर्वरक एवं सामुदायिक गोबर गैस से ईधन की पूर्ति हो सके।
      उन्होंने गांवों में पशुओं के लिए गौठान निर्माण के लिए जगह का चिन्हांकन करने के साथ माडल नक्शा बनाने को कहा जिससे एकरूपता रहे। उन्होंने गौठान के पास नलकूप खनन कर इसमें सोलर पम्प लगाने, पानी की टंकी स्थापित करने और तार से फेसिंग कराने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि किसान उपयोग से बचा हुआ पैरा गौठान में दे सकते है। यहां पैरा की कटाई के लिए पैरा कुट्टी मशीन भी लगायी जा सकती है। गौठान के नजदीक वर्मीकम्पोस्ट खाद बनाने और गोबर गैस संयंत्र लगाने का कार्य भी किया जा सकता है और इसके माध्यम से गोबर गैस कनेक्शन घर-घर भी दिया जा सकता है। इसी प्रकार नस्ल सुधार की भी व्यवस्था भी की जा सकती है। गौठान की व्यवस्था से पशुओं के द्वारा फसलों की चराई की समस्या भी दूर होगी। इसी तरह दूध संग्रहण केन्द्र और कलामंच भी बनाया जा सकता है। इसी तरह दुधारू पशुओं की देखरेख के लिए समिति भी बनायी जा सकती है। 
     

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