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विश्व मानवाधिकार दिवस: 86 फीसदी को जानकारी नहीं, बुजुर्गों के साथ सबसे ज्यादा अन्याय


भारत सहित पूरी दुनिया में हर साल 10 दिसंबर को विश्व मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है। दुनिया में जब कोई इंसान पैदा होता है तो उसे कुछ अधिकार खुद-ब-खुद मिल जाते हैं। दुनिया में आजादी, बराबरी और सम्मान के साथ रहना इंसान का जन्मसिद्ध अधिकार है। उसे अपने अधिकारों का पता हो या न हो लेकिन समाज और सरकारों की जिम्मेदारी होती है कि वे उसके मानव होने के अधिकारों की रक्षा करें। अगर कोई वंचित है तो इसका मतलब यह नहीं कि उसे हमेशा वंचित ही रखा जाए। इस अवसर पर दुनियाभर के 48 देश संयुक्त राष्ट्र जनरल असेंबली में एक साथ होंगे। यह मानवता के खिलाफ हो रहे अत्याचारों को रोकने का एक वैश्विक प्रयास है। 

86 फीसदी को नहीं पता उनके अधिकार

ये अधिकार हर मनुष्य को जन्म से प्राप्त हैं। दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति को इन अधिकारों की जानकारी होनी चाहिए। लेकिन भारत में जो आंकड़े आए हैं वह बेहद चौंकाने वाले हैं। एक संस्था द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में 86 फीसदी लोग अपने अधिकार नहीं जानते हैं। 

बुजुर्गों के अधिकारों का सबसे ज्यादा उल्लंघन

संस्था द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में सबसे ज्यादा बुजुर्गों के मानवाधिकारों का उल्लंघन होता है। जिन बुजुर्गों के साथ अत्याचार होता है उनमें अधिक संख्या में छोटे परिवारों से हैं। जिन्हें सिस्टम से संपर्क साधने संबंधित कोई जानकारी नहीं है। संस्था ने इस अध्ययन में पांच हजार लोगों को शामिल किया है।  

शहरों में हालात सबसे अधिक खराब

जहां शहरों में साक्षर लोगों का आंकड़ा गांवों के मुकाबले अधिक माना जाता है। वहीं रिपोर्ट में कुछ और ही बात सामने आई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि शहरी इलाकों में स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। यहां 23 फीसदी लोग अमानवीय परिस्थिति में रहने को मजबूर हैं। वहीं 13 फीसदी लोगों का कहना है कि उन्हें उनकी उम्र के मुताबिक उचित भोजन नहीं मिलता है। अध्ययन के अनुसार देश में 68.8 फीसदी लोगों को जरूरी दवाएं और स्वास्थ्य सेवाएं भी उपलब्ध नहीं हैं।

जागरुकता की कमी

रिपोर्ट के आंकड़ों से पता चलता है कि सर्वेक्षण में शामिल आधे लोगों का कहना है कि उनके साथ होने वाले भेदभाव और अपमान का कारण उनकी बढ़ती उम्र है। जो लोग इन अधिकारों से अंजान हैं उनमें अधिकतर की आयु 60-70 साल के बीच है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसा इसलिए भी हो रहा है क्योंकि मानवाधिकारों के बारे में जागरुकता की कमी है।

बच्चों की स्थिति के मामले में 116वें नंबर पर भारत

बच्चों की बेहतर स्थिति पर किए गए एक अध्ययन में 172 देशों को शामिल किया गया था। जिसमें भारत का नंबर 116वां है। हैरान करने वाली बात ये है कि इस मामले में श्रीलंका (61वां), भूटान (93वां) और म्यांमार (112वां) की स्थिति भारत से बेहतर है। वहीं नेपाल (134वां), बांग्लादेश (134वां) और पाकिस्तान (148वें) की स्थिति भारत से काफी खराब है।

बाल मजदूरी में लगे हैं 3.1 करोड़ बच्चे

भारत में 3.1 करोड़ बच्चे और अव्यस्क बाल मजदूरी में लगे हुए हैं। ये आंकड़ा दुनिया के किसी भी देश से अधिक है। इनकी उम्र 4-18 साल के बीच है। वहीं 4.8 करोड़ बच्चों को जरूरत के मुताबिक भोजन नहीं मिल पा रहा है। बता दें ये आबादी कोलंबिया की कुल आबादी के बराबर है।

सीरिया में हालात बेहद खराब

मानवाधिकारों के मामले में सीरिया के हालात सबसे अधिक खराब पाए गए हैं। यहां 6 सालों में 5 लाख से अधिक लोगों की मौत हुई है। यहां सबसे ज्यादा इन अधिकारों का उल्लंघन होता है। वहीं बीते 6 सालों में सीरिया से करीब 1.3 करोड़ लोगों ने अपना घर छोड़ा दिया है और शरणार्थी बन गए हैं। यहां के 35 लाख बच्चे मूलभूत अधिकारों से वंचित हैं। यह आंकड़े शरणार्थियों के अधिकार समूह ने जारी किए हैं। आंकड़े मार्च 2011 से नवंबर 2017 के बीच के हैं। जिन लोगों की मौत हुई है उनमें बच्चों की संख्या 26,466 है। 

1993 में अमल में आया था मानवाधिकार कानून

भारत में मानवाधिकार कानून 28 सितंबर, साल 1993 को अमल में आया था। इसके बाद अक्तूबर, साल 1993 में सरकार ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन किया। पहली बार विश्व मानवाधिकार दिवस की घोषणा 10 दिसंबर, साल 1948 को संयुक्त राष्ट्र ने की थी। संयुक्त राष्ट्र असेंबली ने ये घोषणा विश्व मानवाधिकार घोषणा पत्र जारी करने के बाद की। कानून द्वारा संरक्षित इन अधिकारों का प्रत्येक मनुष्य स्वाभाविक रूप से हकदार है। 

मानवाधिकारों से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसले

सुप्रीम कोर्ट – फोटो : PTI

गिरफ्तारी से संबंधित कानून

मानवाधिकारों के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बड़े फैसले सुनाए हैं। 25 अप्रैल, साल 1994 में कोर्ट ने कहा कि हर किसी को जीवन जीने और स्वतंत्रता का अधिकार है। इसमें कहा गया कि जब भी किसी शख्स की गिरफ्तारी हो तो उसे उसकी वजह बताई जाए और उसे अपने किसी रिश्तेदार को भी ये बात बताने का मौका दिया जाए। इसमें यह भी कहा गया कि गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मेट्रोपॉलिटन मेजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य होगा। 

एसिड अटैक से संबंधित कानून 

18 जुलाई, साल 2013 में कहा गया कि एसिड अटैक पीड़ित को तीन लाख रुपये का मुआवजा दिया जाएगा। तीन लाख में से एक लाख रुपये एफआईआर दर्ज होने के 15 दिनों के भीतर दिए जाएंगे। वहीं पीड़ित के इलाज का सारा खर्च भी राज्य सरकारों को ही वहन करना होगा। इसके अलावा कोई भी अस्पताल चाहे वह निजी ही क्यों न हो मुफ्त इलाज और सर्जरी से मना नहीं करेगा।

सीवर की सफाई से संबंधित कानून

27 मार्च, साल 2014 को कोर्ट ने कहा कि बिना सुरक्षा उपकरणों के किसी भी मजदूर को सीवर की सफाई के लिए न उतारा जाए। अगर कोई इस कानून का उल्लंघन करता है तो उसे 5 साल की सजा का प्रावधान है। कोर्ट ने यह भी कहा कि जो लोग खतरनाक स्थितियों में सीवर की सफाई करते हैं, उनकी एक लिस्ट बनाई जाए। इसके साथ ही उनके बच्चों को स्कॉलरशिप और घर बनाने लिए सहयोग मिले। साथ ही परिवार के किसी एक सदस्य को किसी कामकाज की ट्रेनिंग दी जाए।

किन्नरों से संबंधित कानून

15 अप्रैल, साल 2014 को किन्नरों से संबंधित नियम आए। कोर्ट ने किन्नरों को तीसरे जेंडर के तौर पर मान्यता दी। कोर्ट ने कहा कि काफी समय से ये लोग समाज में भेदभाव और अपमान झेलते आ रहे हैं। इनके संवैधानिक अधिकारों का भी उल्लंघन होता आया है। इसलिए अब समय आ गया है कि इनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा हो। सरकार ऐसे कदम उठाए जिससे इन्हें समाज में मान-सम्मान मिल सके। इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि समाज से डर, शर्म, डिप्रेशन और सामाजिक दबाव को खत्म किया जाए। 

कोई भी कर सकता है शिकायत

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग की वेबसाइट http://nhrc.nic.in पर जाकर कोई भी नागरिक अपने अधिकारों के हनन को लेकर शिकायत दर्ज करा सकता है।

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