साइबर अपराध पर अंकुश लगना जरूरी…..

जैसे जैसे सूचना तकनीक का विकास हो रहा है, हम मानव संसाधन पर होने वाले खर्च की कटौती की वजह से आॅटोमेशन पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। इस लिहाज से सामान्य कामकाज में सूचना तकनीक का इस्तेमाल वाकई कमाल की चीज है। कभी इसी भारतवर्ष में लोगों को आपात स्थिति में फोन करने के लिए टेलीफोन एक्सचेंज में ट्रंककॉल लगाने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता था।
अपनी बैंक पासबूक को अद्यतन कराने के लिए बैंक कर्मचारियों की चिरौरी करनी पड़ती थी। अब यह सारा कुछ चुटकी बजाते संभव है। मोबाइल क्रांति के युग में इनके अलावा हम देश दुनिया की उन तमाम सूचनाओं से पलभर में वाकिफ हो रहे हैं, जिन्हें जानने में पहले हफ्तों लग जाया करते थे।
लेकिन इस किस्म की सूचना तकनीक के इस्तेमाल की खामियां भी उतनी ही तेजी से देश में पैर पसार रही है। सूचना तकनीक पर आधारित लेन-देन संबंधी प्रक्रिया में सेंधमारी आम बात हो गयी है। साइबर सुरक्षा मामलों पर नजर रखने वाले संगठन साइबर लॉ डॉट नेट की ओर से साइबर खतरों के बारे में आगाह किया गया है।
उसके द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले दो साल के दौरान 300 प्रतिशत की दर से साइबर क्राइम बढ़े हैं। तकनीकी युग में आज आॅनलाइन बैंकिंग, शॉपिंग, ट्रेडिंग व बिजनेस का प्रचलन बढ़ गया है, सोशल मीडिया के उपयोगकर्ताओं के साथ ही साइबर क्रिमिनल्स का भी दखल बढ़ गया है। जिस गति से इंटरनेट डेटा की खपत हो रही है, प्रयोगकर्ताओं की संख्या बढ़ती जा रही है, उस गति से कंप्यूटर क्राइम से निबटने की प्रणाली को विकसित नहीं किया जा सका है।
इस आशंका के बीच सबसे पहले डेटा की खपत पर खुलेआम पड़ने वाले डाका पर जनता को जागरुक किया जाना चाहिए। कई बार मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनियों की तरफ से अनैतिक किस्म के प्रलोभन भी दिये जाते हैं। जिसके खतरे को नहीं जानते हुए इस्तेमाल करने वाला मोबाइल धारक अपनी डेटा को अपनी जानकारी के बिना ही खर्च करने लगता है। साइबर सुरक्षा के मामले में आगे कुछ भी कार्रवाई हो, उससे पहले देश को इस बात की जानकारी होनी चाहिए कि प्रति दिन खासकर प्रीपेड मोबाइल धारकों से इन मोबाइल सेवा कंपनियों को कितने रकम की प्राप्ति होती है।
दूसरी तरफ इन्हीं कारणों से जब लोग अपनी निजी सुविधा का इस्तेमाल करते हुए नेट का इस्तेमाल अपने मोबाइल से करते हैं तो मोबाइल धारक की अनेक निजी सूचनाएं अपने आप ही दूसरों तक पहुंच जाती हैं क्योंकि मोबाइल बनने वालों में अपनी तरफ से इसके प्रबंध किये हुए हैं। आम आदमी भी इसे समझता है कि उसकी जानकारी के बिना भी उसके खरीदे हुए समय और डेटा का ढेर सारा हिस्सा खर्च हो जाता है।
इस पर सबसे पहले रोक लगनी चाहिए ताकि मोबाइल कंपनियों की यह मनमानी रूक सके। जब मोबाइल कंपनियों पर राष्ट्रीय स्तर पर यह अंकुश लगेगा तो वे भी अपनी तरफ से अनैतिक कारोबार को प्रोत्साहन नहीं देंगे जिससे साइबर क्राइम में कुछ हद तक कमी आयेगी। इसके साथ साथ साइबर क्राइम में संलग्न लोगों की गतिविधियों पर भी कठोर कार्रवाई के नये नियम बनने चाहिए।
साइबर क्राइम में सबसे अधिक शिकायत ठगी और लोगों के पैसों की चोरी का है। झारखंड का जामताड़ा जिला इसमें काफी बदनाम हो चुका है क्योंकि देशभर के साइबर क्राइम के मामलों में किसी न किसी में इस इलाके की मिलीभगत की बात लगातार सामने आ रही है। इसलिए हमें इस बात पर ध्यान देना होगा कि साइबर सुरक्षा की खामियों का फायदा उठाते हुए साइबर क्रिमिनल्स की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है।
इसे रोकने के लिए साइबर जगत से जुड़े विशेषज्ञों ने बेहतर साइबर लॉ बनाने की वकालत की है। सबसे ज्यादा मामले डेबिट-क्रेडिट कार्ड पैसा निकालने, हैकिंग के जरिए मनी ट्रांसफर करने, स्पैम व फिशिंग के जरिए कम्प्यूटरों से महत्वपूर्ण सूचनाओं की चोरी कर उसके बदले धन उगाही करने जैसे अपराधों में इजाफा हुआ है। नाइजेरियाई हैकरों की सक्रियता के साथ ही चाइल्ड पोर्नोग्रॉफी के मामले भी बढ़े हैं।
भारत में 81 फीसदी लोग सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं, जबकि 84 फीसदी आस्ट्रेलियाई नागरिक नेट सर्फर व सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं। लिहाजा अब बाजार के आकार और आर्थिक ताकत को समझते हुए सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर इस दिशा में काफी कुछ किये जाने की जरूरत है। अगर हम इस किस्म की अनैतिक गतिविधियों को नहीं रोक पाये तो यह भी तय है कि सामाजिक दबाव की वजह से अंतत: देश में मोबाइल इस्तेमाल के आंकड़े अचानक तेजी से नीचे आ जाएं क्योंकि आज भी लोग अपने बच्चों को मोबाइल और नेट के इस्तेमाल की खुली छूट देने से परहेज करते हैं।
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