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ओबीसी के राजनीतिक महत्वाकांक्षा से भाजपा संकट में

बिलासपुर (शशांक दुबे )। ओबीसी और एसटी की राजनीति ने राजनैतिक दलों के लिए नई मुसीबत खड़ी की है। राज्य में 124 जाति ओबीसी में आती है, राज्य का गठन एसटी बहुल क्षेत्र के नाम पर हुआ। अतः इस वर्ग की अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षा है, जो उचित भी है।

जिले में 7 विधानसभा सीट में मरवाही एसटी और मस्तूरी एससी को आरक्षित है। शेष सीट तखतपुर, बिल्हा, बेलतरा, बिलासपुर, अनारक्षित है। लोक प्रतिनिधित्व कानून में सीट का आरक्षण एससी, एसटी है। मतलब सामान्य, क्षत्रिय, ब्राह्मण और अग्रवाल तथा महिला के लिए 124 जाति ओबीसी के साथ ही व्यवस्था होनी है। यही गणित कोटा में भाजपा को परेशान कर रहा है। भाजपा इस सीट को मध्यप्रदेश के वक्त से हार रही है। पार्टी ने सब अजमाया। ठाकुर, अग्रवाल, ब्राम्हण पर ओबीसी पर जीत नहीं मिली।

हाल ही में कोटा में सर्वआदिवासी समाज की बैठक हुई, वे राजनीतिक दलों में अपनी टिकट तलाशने बैठे थे। बाद में इस निर्णय की पर पहुंचे की अपने बैनर पर प्रत्याशी उतारेंगे। भाजपा ने पिछली बार 2013 में यहां से काशी साहू को टिकट दिया था, वे हारे। राज्य की राजनीति में भाजपा के लिए ओबीसी वोट अत्यंत महत्वपूर्ण है यही कारण है कि हारे हुए विधानसभा अध्यक्ष पार्टी के अध्यक्ष हैं और पार्टी ने सत्ता संगठन में कई स्थान पर ओबीसी को स्थान दिया है। अब जब एसटी नेता सामान्य सीट से भी टिकट मांगेंगे तो ओबीसी अपने लिए ज्यादा कठोरता से टिकट मांग रही है। पर कोटा में राजनीति भिन्न है यहां इस बार काशी साहू का विरोध सुर पकड़ गया है।

पार्टी के भीतर इस बार यह माना जा रहा है कि राज्य के सीएम और प्रभारी भी इस सीट को जीत ने विशेष नीति बना रहे हैं यही कारण है कि टिकट के लिए दावेदार ज्यादा जोर दे रहे हैं। पार्टी में फिलहाल काशी साहू का विरोध है विरोधी उनके वो मामले बाहर निकाल रहे हैं जिनका संबंध 2001-2003 के बीच है। उस वक्त का कनकी घोटाला जो लोरमी के एक अग्रवाल ठेकेदार के साथ खेला गया। जिसे उस वक्त के एक कांग्रेसी ठाकुर नेता का संरक्षण था। साहू पर यह आरोप भी है कि बीजेपी जिस पीडीएस प्रणाली का गुणगान करती है उसी सिस्टम में जबरदस्त सेंधमारी का मास्टर माइंड है ओबीसी नेता। कोटा के टिकट को लेकर तीनों राजनैतिक दल असमंजस में हैं और दो दल भाजपा कांग्रेस के टिकट दावेदार रोज घात प्रतिघात खेल रहे हैं।

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